मार्क्सवाद - लेनिनवाद के खिलाफ दुष्प्रचार लगातार जारी है। जाहिर है की मार्क्सवाद या लेनिनवाद इन पूंजीपतियों - सामंतो तथा मथाधीशो के हितों के खिलाफ है तो वो उसकी बुराई या उसकी कमजोर नस पर हाथ रखने से कब पीछे हटेंगे। पिछले साल दो साल से हमारे देश में भी वामपंथ विरोधी मुहीम चल रही है और इस मुहीम रुपी आग में घी डालने का कम नक्श्ली कर रहे है।
आज के हिंदुस्तान अख़बार में आशुतोष जी का लेख पढ़ा । लेख की हेडिंग है की यह सर कलम करने वाली विचारधारा हैमेरा उनसे यही से मतभेद शुरू हो जाता है। उनका पहला बिन्दु है की वामपंथ लोकतंत्र विरोधी है। यही उनका भटकाव है। शायद उन्होंने ठीक से अभी वामपंथ का इतिहास नही पढ़ा है या पढ़ा भी है तो वो ही इतिहास पढ़ा है जो पूंजीवादी या दक्षिण पंथी इतिहासकारों ने लिखा है। सफल लोकतंत्र की मिसाल चीन, वेनेजुएला, चिली सहित कई अन्य देश है, जिन पर भाई आशुतोष को द्रश्तिपात करने की जरूरत है। उन्होंने अपने को वामपंथ से अलग रखने का दूसरा कारन बताया है की यह मानवाधिकारों में यकीन नही रखता, जबकि सच्चाई यह है की वामपंथियों के शासन में कम से कम मर्डर होते है। उसके भी पीछे असली कारन है की वामपंथियों के शासन में हर मुकदमा लिखा जाता है जबकि अन्य लोगो के शासन में तो ऍफ़ आई आर तक नही लिखी जाती। तीसरे कारन के रूप में आसुतोष भाई ने लिखा की ये हिंसा के समर्थक है तो भाई आसू जी क्या हमको आज़ादी यू ही मिल गई थी? बिना हिंसा के गाँधी जी पूरा जीवंन देने के बावजूद यदि क्रन्तिकारी साथी न होती तो क्या हम आज आजाद होते?
वामपंथ या उसके अगुआ लोगो की तुलना हिटलर से करना सिरे से ही बेवकूफी है। हिटलर फासीवादी था वो ऐक धर्म विशेष के लोगो के शासन में यकीन रखता था जबकि वामपंथी साम्यवाद में यकीन रखते है। वो जनता के ८० फीसद हिस्से का प्रतिनिधित्व करते है। वो जनता के हितों में अपना हित देखते है । इसकी जीती तस्वीर चीन है जो हमसे बाद में आजाद हुआ और आज हमसे आगे है। वहां वाम दल का शासन था उन्होंने जनता के हित में काम किया और यहाँ क्या हुआ ये सबके सामने है।
हाँ आशुतोष जी की एक फिक्र जायज है और वो है नक्सलवाद । यह उन तथाकथित वामपंथियों का जमावदा है जो बन्दूक से शासन में यकीन रखते है। येह वामपंथ के नाम पर बदनुमा दाग है। असली मार्क्सवादी या वामपंथी जनता को उसके अधिकारों के लिए जाग्रत करते है, और उनके अधिकारों को दिलाने के लिए उनको लामबंद करते है और फ़िर आन्दोलन करते है।
वामपंथ कोई बाज़ार की वस्तु नही है । इस पूंजीवादी बाज़ार में वामपंथ बिक भी नही सकता। हाँ उसका विरोध जरूर बिक सकता है, उसे ही बेचने की कोसिस की जा रही है। वामपंथ मुनाफा कमाने की वस्तु भी नही है, सो इसका गुणगान भी करना ठीक नही है। ...... लेकिन भाई आशु जी तथ्यों को समझने की भी जरूरत है। वामपंथ जनता के अधिकांश हिस्से को फायदा पंहुचाआने के लिए जो भी सम्भव है, वो करता हैउसमे क्रांति भी शामिल है।
