Monday, October 19, 2009
दिवाली या दीवाला ?
इस बार मई दिवाली में लखनऊ में ही रहा, आमतौर पर मै अभी तक त्योहारों पर अपने गावमें अपने घर पर ही रहा हूँ। इस बार दिवाली में मैंने देखा की यहाँ यानि लखनऊ की दिवाली मेरे गाव की दिवाली से काफी अलग है। मसलन गाव में दिवाली पर बाज़ार सजते है, खूब खरीददारी होती है। सभी मिलजुल कर त्यौहार मानते है और खुश होते है। दुकानदार इसलिए खुश होता है की उसकी दुकानदारी बढ़ जाती है। त्यौहार की वजह से खूब बिक्री होती है जिससे उसे मुनाफा होता है। लेकिन लखनऊ में पिछले एक दो त्योहारों के दौरान मैंने महसूस किया की त्योहारों में खुशी कम महंगाई अधिक बढ़ जाती है। लखनऊ में नरही मार्केट जाकर इस बात को और आसानी से समझा जा सकता है। अब आप कहेंगे की कोई नरही ही क्यो जाएगा, लेकिन दिक्कत तो उसके साथ है जो वही आस पास ही रहता है। इस मार्केट में त्योहारों पर हर वस्तु के दाम दोगुने हो जाते है। ऐसे में हम तो यही कहेंगे की इस बार दिवाली में दिवाला निकल गया.
