Tuesday, October 20, 2009

चीन और भारतीय मीडिया

आज कल भारत के मीडिया के एक हिस्से में लगातार चीन विरोधी खबरे प्रसारित और प्रकाशित हो रही है। इन खबरों के अनुसार चीन लगातार सीमा का उलंघन कर रहा है। जबकि हमारे देश के प्रधानमंत्री तक ने इन खबरों का खंडन किया है। सवाल यह है की जब देश का नेत्रत्व यह स्वीकार कर रहा है की कोई सीमा उल्लंघन का मामला नही है, तो वो कौन है जो इस तरह की खबरों को हवा दे रहा है या मीडिया के जरिये ये माहोल तैयार किया जा रहा है की हमें चीन से बहुत गंभीर खतरा है। जहाँ भारतीय मीडिया इस तरह की गर्म खबरे परोस रहा है वही चीनी मीडिया खामोस है।
मामले की पड़ताल करते समय हमें यह भी ध्यान रखना होगा की इसी तरह वाक युद्घ चलता है और मामला गरमा जाता है तो उस इस्थिति में फायदा किसका होगा। जाहिर है की भारत या चीन का तो फायदा इसमे होना नही है। क्योकि युद्घ होने की दशा में दोनों देशो का नुकसान होना तय है, इसलिए दोनों देशो का नेत्रत्व लगातार शान्ति बनाये हुए है। तो सवाल उठता है की युद्घ होने में फायदा किसका है, तो हमें बिना दिमाग पर जोर डाले पता चल जाएगा की इसमे फायदा अमरीका को होगा। क्योकि अमरीका में लगातार मंदी का माहोल है, उसकी खेती उसके हथियार है, अतः वो अपने हथिया भारत को बेचना चाहता है, लेकिन भारत हथियार क्यो खरीदेगा, इसलिए युद्घ जरूरी है, इसलिए अमरीका लगातार भारत चीन विरोधी ख़बरों को हवा दे रहा है और हमारे कुछ मीडिया के साथी अनजाने में उसके हथियार बने हुए हैं।

Monday, October 19, 2009

दिवाली या दीवाला ?

इस बार मई दिवाली में लखनऊ में ही रहा, आमतौर पर मै अभी तक त्योहारों पर अपने गावमें अपने घर पर ही रहा हूँ। इस बार दिवाली में मैंने देखा की यहाँ यानि लखनऊ की दिवाली मेरे गाव की दिवाली से काफी अलग है। मसलन गाव में दिवाली पर बाज़ार सजते है, खूब खरीददारी होती है। सभी मिलजुल कर त्यौहार मानते है और खुश होते है। दुकानदार इसलिए खुश होता है की उसकी दुकानदारी बढ़ जाती है। त्यौहार की वजह से खूब बिक्री होती है जिससे उसे मुनाफा होता है। लेकिन लखनऊ में पिछले एक दो त्योहारों के दौरान मैंने महसूस किया की त्योहारों में खुशी कम महंगाई अधिक बढ़ जाती है। लखनऊ में नरही मार्केट जाकर इस बात को और आसानी से समझा जा सकता है। अब आप कहेंगे की कोई नरही ही क्यो जाएगा, लेकिन दिक्कत तो उसके साथ है जो वही आस पास ही रहता है। इस मार्केट में त्योहारों पर हर वस्तु के दाम दोगुने हो जाते है। ऐसे में हम तो यही कहेंगे की इस बार दिवाली में दिवाला निकल गया.

Monday, October 12, 2009

आख़िर मिल ही गई डॉ. के. के सिंह को क्लीन चिट

लखनऊ स्थित के के नर्सिंग होम के संचालक डॉ के के सिंह व् उनके अन्य भाइयो के साथ ही उनके पिता डॉ के ऍम सिंह पर वही की एक छात्रा सत्यभामा सिंह उर्फ़ अंजली सिंह ने यौन उत्पीरण का आरोप लगाया है। उसके अनुसार वहां के पी आर ओ राम जी बाजपाई के द्वारा ही उक्त लोगो द्वारा उसके सामने यह प्रस्ताव रखा गया। जब उसने इस प्रस्ताव को मानने से मना कर दिया तो उसका एक्जाम जो अगस्त २००८ में होना था उसे नही देने दिया गया। इस बात का जब छात्रा द्वारा वहां की कार्यकारी संचालक अनीता सिंह को बताया गया तो उन्होंने भी उसे वहां से भगा दिया और हाजिरी कम होने से एक्जाम रोकने की बात कही। जबकि इसके मूल में कारन वही था जो सत्यभामा बता रही थी। इस बीच राम जी बाजपाई सत्यभामा के कमरे पर लड़किया लेकर आने लगा। सत्यभामा ने इसका भी विरोध किया और कोलेज प्रबंधन से इसकी सिकायत की लेकिन किसी ने उसकी बात पर यकीन नही किया और सबूत मांगे। मजबूर होकर छात्रा ने अपने किसी परिचित का कैमरा मांग कर रामजी की करतूतों की रिकार्डिंग की और और अनीता सिंह, के एम् सिंह के के सिंह व् अन्य लोगोको को दी किंतु उन लोगो ने रामजी या किसी अन्य के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय उसी को ग़लत साबित करने लगे । मजबूरी में उसने मीडिया व अन्य महिला संगठनों से सम्पर्क किया है। अब जांच हो रही है लेकिन आज के अखबारों के अनुसार रामजी बाजपाई के अलावा सभी को क्लीनचिट मिल गई है और रामजी फरार है।
विदित हो की के के सिंह पहले भी कई प्रकार के विवादों में सामिल रहे है किंतु अपनी उऊंची पहुँच और पैसे के दम पर वो हर बार बाइज्जत रिहा होते रहे है। इस बार भी वही हो रहा है। जाँच रामजी बाजपाई पर आकर रूक गई है जो की अभी फरार है।'
जाहिर है की पूंजीवादी समाज में हर कम पूजी यानि पैसे से सम्भव है। ऐसे समय में न्याय का गला भी पैसे से घोंटना सम्भव है। किंतु हमें २००४ का आशियाना बलात्कार कांड भी नही भूलना चाहिए जिसमे पाँच रईसजादों ने एक मासूम १३ वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार किया और उसके जिस्म को सिगरेट से दगा था। वो लड़की एक बहुत ही गरीब परिवार से थी। और उसने लडाई लड़ने की ठानी जबकि विरोध में थी तत्कालिन सपा सरकार और राज्य महिला आयूग। ......पर आज, ......पाँच में से चार लोगो को सजा हो चुकी है और पाँचवे का केस ट्रायल पर है।
हमें इन बच्चियों से कुछ सीख लेनी होगी जो आज समाज के उन ठेकेदारों से लोहा ले रही है जिनके पास सत्ता है, पर अफ़सोस हम सब खामोश है। जबकि यह लडाई सिर्फ़ उनकी अपनी लडाई नही है, यह लडाई उन सब बच्चियों की लडाई है जो इन वहशियों के चंगुल में फंस चुकी है या आने वाले समय में फंस सकती है।